15 March 2000

गर जाना ही था


आए क्यों इस ज़िंदगी में गर जाना ही था
किया क्यों मुझसे वो प्यार जो निभाना ना था

दिखाए क्यों वो सपने जिन्हें सजाना ना था
बनाया क्यों वो घर जिसे गिराना ही था

तुम गये, सब कुछ गया
आख़िर जाना ही था

चैन गया, नींद गयी, दिल का करार भी गया
तुम्हारे साथ, मेरे लिए तुम्हारा प्यार भी गया

सजी तुम्हारे हाथों में मेहन्दी, बहे इधर खून के आँसू
उठी जब तुम्हारी डोली, इस दिल का सारा सुकून भी गया

रह गयीं इस दिल में बस यादें तुम्हारी
बस गयी इस दिल में तस्वीर सिर्फ़ तुम्हारी

लुट गयी ह्मारी दुनिया सारी
नहीं गया तो तुम्हारे लिए ह्मारा प्यार न गया...

21 October 1999

क्यों लगा बैठता है इंसान दिल किसी से...


क्यों लगा बैठता है इंसान दिल किसी से
जानते हुए की मिलन है नामुमकिन उससे

क्यों कर बैठता है दिल म्होब्बत किसी से
जानते हुए की म्होब्बत है उसे किसी और से

छलकते हैं क्यों यह अश्क पलकों से ह्मारी
क्यों उड़ जाती हैं नींदें आँखों से ह्मारी

दिखती है क्यों ख्वाबों में तस्वीर सिर्फ़ तुम्हारी
क्यों देती है हरपल सुनाई, आवाज़ वो तुम्हारी

जाती नहीं क्यों इस दिल से यादें तुम्हारी
क्यों समा गये तुम दिल की गहराइयों में ह्मारी

समा कर इस दिल में क्यों हो गये तुम जुदा
क्यों रह गया इस भीड़ में मैं अकेला और तन्हा

सुना था अंजाम-ए-म्होब्बत नहीं होता कभी बुरा
फिर मुझे ही क्यों मिला म्होब्बत का ये सिला...

01 November 1998

तलाश है इक हमसफर की...



ज़िंदगी की इन तन्हाईओं को
तलाश है इक हमसफर की

समझ ले आँखों से दिल की ज़ुबान
तलाश है ऐसी इक नज़र की

चेहरे पे हो जिसके वो चाँद की सी चमक
ज़ुल्फो में हो जिसकी गुलाबों की सी महक


बातों में हो जिसकी झांझारों सी झनक
हँसी में हो जिसकी घुंघरुओं की सी ख़नक

आँखों में हो जिसकी मे सा इक नशा
अधरों पे हो जिसके शहद की सी रसा

हाथों में हो जिसके स्पर्श वो रेशम सा
चाल में हो जिसकी बॅल वो नागिन सा

दामन में हो जिसके सुकून वो खुदा सा
स्पर्श में हो जिसके प्यार वो सबसे जुदा

ज़ुबान पर हो जिसकी बात वो मेरे ही दिल की
दुख में मुझे सभाले जो, हो सुख में मेरे शामिल भी.

05 May 1998

कहाँ तुम चले गये...


आँखों में मेरी अब भी,
आँसू वो तुम्हारे हैं...
कैसे भूलूँ वो लम्हे,
तुम संग जो गुज़ारे हैं...
इक पल का था तेरा साथ,
जीवन है अंधेरी रात,
कहाँ तुम चले गये...

तेरी पायल की रुन झुन,
तेरी चूड़ी की छन छन...
है कानों में अब भी,
तेरी हँसी की वो ख़न्न् ख़न्न्...
सूने हैं मेरे सब गीत,
यूँ छीन के ही संगीत,
कहाँ तुम चले गये...

01 November 1997

इक तारा...!!!

दूर गगन में इक तारा है
सब तारों से न्यारा है
घंटों बैठ बचपन से जिसे, मैंने खूब निहारा है
दूर गगन में इक तारा है...
मेरी जीत मेरी हार,मेरी नफ़रत मेरा प्यार
हर राज़ का है वो राज़दार
मेरे सुख दुख का वोही तो इक सहारा है
दूर गगन में इक तारा है...
तुम्हारी यादों का सफ़र भी मैंने 
उसी के संग गुज़ारा है
तुम्हारे बाद, मेरी तन्हाइयों का वही इक सहारा है
जब भी तुम्हारी याद आई
उसी को मैंने पुकारा है
दूर गगन में इक तारा है...
गर मिलो मुझे फिर कभी
तो मिलना उस तारे से भी
पूछना उससे की तुम बिन
कैसे समय गुज़ारा है
दूर गगन में इक तारा है...
वो बातें जो कह ना सका तुमको
कह डालीं उसको
ना समझ पाया कि वोह तुम नहीं, इक तारा है
देखूं जब भी उसे यूँ लगे
कि जैसे चेहरा तुम्हारा है
दूर गगन में इक तारा है...

01 October 1997

तन्हाइयों का सफ़र

कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जैसे बरसात के दिनों में बच्चों का रुके पानी में काग़ज़ की नावें तेराना. ये नावें तैरती तो हैं पर बहुत दूर तक और बहुत देर तक नहीं.
शायद हमारा रिश्ता भी ऐसी ही एक किश्ती जैसा था...